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Monday, 27 February 2012

ग़जल

सुराख  दुध्ती   है  दुनिया  पाक  दामन मे ,
दाग  न  हो  जिसमे  वो  कौनसा  महताब  लायें ,,

कुछ  किये  बिना  ही  तुझसा  मशहूर  हो  जायें ,
बताओ  की  कहाँ  से  हम  पर  ए सुरखाब  लायें ,,

सुनहरी  चेहरों  की  महफ़िल  मे  शरीक  होने को ,
सोचते  हैं  हम  भी  कभी  सोने  का  नकाब  लायें ,,

सुना  हैं  तुम  हसीं  सपने  बेचते  हो ,
देखें  सौदागिरी  तेरी  खरीद  हम  ख़्वाब  लायें ,,

जिंदगी  मह्खानो  की  उधार  है  मुझपे ,
'निशांत ' जीने  को  कहाँ से  शराब  लायें ,,

anjam

यूँ  न  बहाओ  एक  कतरा  भी  शराब  का ..
मेरे  पैमाने  में  डाल दो  हर  टुकड़ा  शराब  का ...
न  चैये  महफ़िल  हम  दिलजलों  को  पीने  के  लिए ...
न  ज़रूरत  है  मैखाने  की , न  दरकार  है  शबाब  का 


ले  के  हाथों  में  जाम  फिरते  हैं ..
अपने  लबों  पे  लिए  तेरा  नाम  फिरते  हैं ..
फिरते  तो  दीवाने  हैं  इश्क  में  मस्रूख  होकर 
हम  तो  पाकर  मोहब्बत  का  अंजाम  फिरते  हैं 

ले  के  हाथों  में  जाम  फिरते  हैं ..
अपने  लबो  पे  लिए  तेरा  नाम  फिरते  हैं ..


कई  नाम  बने  हैं  आसिकी  में  
खलीफा  हुए  हैं  कई  ,मोहब्बत  में  आकर ...
हम  न  मजनू  हुए  है  न  राँझा  हुए  हैं ...
हम  तो  होकर  गुमनाम  फिरते  हैं ...

ले  के  हाथों  में  जाम  फिरते  हैं ..
अपने  लबों  पे  लिए  तेरा  नाम  फिरते  हैं . 


थामा  हैं  गर  हाथ  में  जाम  तो  क्या ...
हुए  हैं  गर  कहीं  बदनाम  तो  क्या ...
वो  भी  जानते  हो  ये  किसकी  इनायत  है ...
बस  ये  है  की  सर  पे  लिए  इलज़ाम  फिरते  हैं ..

ले  के  हाथों  में  जाम  फिरते  हैं ..
अपने  लबों  पे  लिए  तेरा  नाम  फिरते  हैं ..........................
.................................निशांत 

ग़जल

रात देर तक जाग के देखा,

कोई सितारा बुझा नहीं था।



मैं ही अकेला था महफ़िल में,

फ़िर भी मुझ पर फ़िदा नहीं था।



चाँद भी मुझ सा फिक्रमंद था,

मेरे गम से जुदा नहीं था।



कैसे मजा तुम दर्द का पाते ,

इश्क किसी से हुआ नहीं था.