यूँ न बहाओ एक कतरा भी शराब का ..
मेरे पैमाने में डाल दो हर टुकड़ा शराब का ...
न चैये महफ़िल हम दिलजलों को पीने के लिए ...
न ज़रूरत है मैखाने की , न दरकार है शबाब का
ले के हाथों में जाम फिरते हैं ..
अपने लबों पे लिए तेरा नाम फिरते हैं ..
फिरते तो दीवाने हैं इश्क में मस्रूख होकर
हम तो पाकर मोहब्बत का अंजाम फिरते हैं
ले के हाथों में जाम फिरते हैं ..
अपने लबो पे लिए तेरा नाम फिरते हैं ..
कई नाम बने हैं आसिकी में
खलीफा हुए हैं कई ,मोहब्बत में आकर ...
हम न मजनू हुए है न राँझा हुए हैं ...
हम तो होकर गुमनाम फिरते हैं ...
ले के हाथों में जाम फिरते हैं ..
अपने लबों पे लिए तेरा नाम फिरते हैं .
थामा हैं गर हाथ में जाम तो क्या ...
हुए हैं गर कहीं बदनाम तो क्या ...
वो भी जानते हो ये किसकी इनायत है ...
बस ये है की सर पे लिए इलज़ाम फिरते हैं ..
ले के हाथों में जाम फिरते हैं ..
अपने लबों पे लिए तेरा नाम फिरते हैं ................... .......
मेरे पैमाने में डाल दो हर टुकड़ा शराब का ...
न चैये महफ़िल हम दिलजलों को पीने के लिए ...
न ज़रूरत है मैखाने की , न दरकार है शबाब का
ले के हाथों में जाम फिरते हैं ..
अपने लबों पे लिए तेरा नाम फिरते हैं ..
फिरते तो दीवाने हैं इश्क में मस्रूख होकर
हम तो पाकर मोहब्बत का अंजाम फिरते हैं
ले के हाथों में जाम फिरते हैं ..
अपने लबो पे लिए तेरा नाम फिरते हैं ..
कई नाम बने हैं आसिकी में
खलीफा हुए हैं कई ,मोहब्बत में आकर ...
हम न मजनू हुए है न राँझा हुए हैं ...
हम तो होकर गुमनाम फिरते हैं ...
ले के हाथों में जाम फिरते हैं ..
अपने लबों पे लिए तेरा नाम फिरते हैं .
थामा हैं गर हाथ में जाम तो क्या ...
हुए हैं गर कहीं बदनाम तो क्या ...
वो भी जानते हो ये किसकी इनायत है ...
बस ये है की सर पे लिए इलज़ाम फिरते हैं ..
ले के हाथों में जाम फिरते हैं ..
अपने लबों पे लिए तेरा नाम फिरते हैं ...................
.............................. ...निशांत
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