Tuesday, 28 February 2012

ग़जल

कुछ उन की तरफ़ से भी इशारा नहीं होता 
स्टार्ट आज दिल का खटारा नहीं होता 

बन जाए अगर जान पे , चुपके से खिसक लो 
महबूब कभी जान से प्यारा नहीं होता

मालूम हुई चाँद की जिस दिन से हक़ीक़त
महबूब का रुख़ चाँद का पारा नहीं होता

लैलाएँ नई रोज़ मिला करती हैं नेट पे
अब एक से मजनूँ का गुज़ारा नहीं होता

स्काइप भी हो , कैम भी हो , voice कॉल हो
"आशिक़ का तो चिट्ठी पे गुज़ारा नहीं होता"

इज़हार जो करने का तुझे शौक़ न चढ़ता
चप्पल से तुझे उस ने संवारा नहीं होता

पिटने का कोई डर नहीं, इस प्यार में नेट के
ज़ाहिर ही यहाँ अस्ल तुम्हारा नहीं होता

फिर होता नहीं बीवी की नज़रों में चुग़द वो
अम्मी का अभी तक जो दुलारा नहीं होता

तुकबन्दियाँ 'मुमताज़' हमें आती नहीं हैं
ये तंज़ ओ मज़ह हम से ख़ुदारा नहीं होता

पारा= टुकड़ा, चुग़द= उल्लू, तंज़ ओ मज़ह= हास्य व्यंग 

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