Tuesday, 28 February 2012

ग़जल

फरेब  देगी  भला  और  क्या  सेहर  मुझ  को 
जगाये  रखा  है  ख्वाबों  ने  रात  भर  मुझ  को 

तलाश -ए-आब  में  जो  मंजिल -ऐ-शराब   में  है 
करिश्मा  सजी -ऐ -फितरत  है  वोह  नज़र  मुझ  को 

माता -ऐ -हुस्न -ऐ -तजल्ली  पे  भी  मेरा  हक  है
अता  हुई  है  अगर  रफत -ऐ -नज़र  मुझ  को

में  अपने  फेन    में  तेरे  हुस्न  का  ही  पैकार  हूँ
न  देख  ऐसे  के  लग  जाये  फिर  नज़र  मुझ  को

कभी  तो  तेरी  बुलंदी  का  राज़  मुझ  पे  खुले
कभी  झिंझोड़े  तो  एहसाश -ऐ -बाल -ओ -पर  मुझ  को

तिलिस्म  टूट  रहा  है  तेरी  हकीकत  का
दोहाई  देने  लगा  है  मेरा  हुनर  मुझ  को

सजी  जाने  लगी  है  सलीब  फिर  मंज़र
कहा  न  जाये  कहीं  फिर  पयम्बर  मुझ  को

चमन  में  क्यों  में  जालौन  बहार -ऐ -गुल  के  चारघ
के  ढूंढ लेंगें 
 अंधेरों  में  दीदाह्वर  मुझ  को 

भटक  रहा  हूँ  इधर  में  किरण  किरण  के  लिए
तलाश  करने  चली  है  उधर  सेहर  मुझ  को 

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