Monday, 27 February 2012

ग़जल

है दर्द क्यों और हो कैसे शिफा अब याद नहीं ?
था दोस्तों से की था कातिल से गिला अब याद नहीं 

यु रंग आसमान मैं सितारे नहीं बदला करते 
हुई हो शायद हमसे कोई खता अब याद नहीं 

मेरी आँखों से बहना वो सदा ज़ज्बात का 
कहा था उन निगाहों ने क्या पता अब याद नहीं 

उम्र भर साथ रह केर न वो मेरा हो सका 
जाने कब हुआ वो हमसफ़र जुदा अब याद नहीं

इतने ज़ज्बात -ए -हसीं ने घेर रखा है उन्हें
के शायद मेरा चेहरा -ए -वफ़ा अब याद नहीं

देंगे मेरे खली पैमाने मेरे जकं गवाही
कौन कहता है की निशांत को खुदा अब याद नहीं

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