Monday, 27 February 2012

ग़जल

ज़िंदगी  के  पेच  ओ  ख़म  से  हम  नहीं  थे  वाकिफ मगर ,
हम  जिए ,दिल  से  जिए ,छोरी  नहीं  कोइ  कसार !

तू सरापा  खूब -सूरत  थी , मगर  ई  ज़िंदगी !
हम  ने  ही  पायी नहीं  थी  देखने  वाली  नज़र !

रूह  क्या  है , सागर  ऐ नूर  ऐ  खुदा  की  बूँद  है ,
चैन  आ  जाए  उसे , सागर  में  मिल  जाए  अगर !

दिएर  की  क्यों  ख़ाक  छाने , जब  वो  हर  ज़र्रे  में  है ,
क्यों  न  उसके  अक्स  को  दिल  में  तलाशे  हर  पहर !

हम  ग़रीबों  के  मुक़द्दर  में  कहाँ  गुलशन  लिखे ?
हमने  काग़ज़  के  गुलों  पे  इत्र छिरका  उम्र  भर !

:चैन : था  या  जीस्त  के  साहिल  पे  लिक्खा  लफ्ज़  था ,
जब  मिला  तब  तब  मिटाने  आ  गयी ग़म  की  लहर !

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