ज़िंदगी के पेच ओ ख़म से हम नहीं थे वाकिफ मगर ,
हम जिए ,दिल से जिए ,छोरी नहीं कोइ कसार !
तू सरापा खूब -सूरत थी , मगर ई ज़िंदगी !
हम ने ही पायी नहीं थी देखने वाली नज़र !
रूह क्या है , सागर ऐ नूर ऐ खुदा की बूँद है ,
चैन आ जाए उसे , सागर में मिल जाए अगर !
दिएर की क्यों ख़ाक छाने , जब वो हर ज़र्रे में है ,
क्यों न उसके अक्स को दिल में तलाशे हर पहर !
हम ग़रीबों के मुक़द्दर में कहाँ गुलशन लिखे ?
हमने काग़ज़ के गुलों पे इत्र छिरका उम्र भर !
:चैन : था या जीस्त के साहिल पे लिक्खा लफ्ज़ था ,
जब मिला तब तब मिटाने आ गयी ग़म की लहर !
हम जिए ,दिल से जिए ,छोरी नहीं कोइ कसार !
तू सरापा खूब -सूरत थी , मगर ई ज़िंदगी !
हम ने ही पायी नहीं थी देखने वाली नज़र !
रूह क्या है , सागर ऐ नूर ऐ खुदा की बूँद है ,
चैन आ जाए उसे , सागर में मिल जाए अगर !
दिएर की क्यों ख़ाक छाने , जब वो हर ज़र्रे में है ,
क्यों न उसके अक्स को दिल में तलाशे हर पहर !
हम ग़रीबों के मुक़द्दर में कहाँ गुलशन लिखे ?
हमने काग़ज़ के गुलों पे इत्र छिरका उम्र भर !
:चैन : था या जीस्त के साहिल पे लिक्खा लफ्ज़ था ,
जब मिला तब तब मिटाने आ गयी ग़म की लहर !
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