Wednesday, 29 February 2012

ग़जल

मंसूब उन से दिल की कहानी करूँगा मैं

जोशे जुनूँ में रास्ता लूँगा मैं दश्त का
बस्ती को सारी दुश्मने जानी करूँगा मैं

सो जाऊँगा मैं ओढ़ के मिटटी तिरी,वतन
हरगिज़ न डर से नकले मकानी करूँगा मैं

खोलूँगा फ़िक्र ओ फ़न की नई राह शेर में
कोइ भी बात अब न पुरानी करूँगा मैं

अलफ़ाज़ के तिलिस्म चलाऊँगा रात दिन
ग़ज़लों में अपनी जादू बयानी करूँगा मैं

लिख कर कोई हसीन ग़ज़ल तेरे नाम की
यूं किश्ते जाँ का रंग भी धानी करूँगा मैं

इक रोज़ उन को सहने चमन में बुलाऊंगा
इक रोज़ शाम अपनी सुहानी करूँगा मैं

जब मैं सफ़र करूंगा कभी शब् में देर तक
हम राह अपने रातों की रानी करूंगा मैं

हिद्दत से संग दिल भी पिघल जाएगा ज़रूर
कुछ और तेज़ सोजे निहानी करूंगा मैं

आँखों से मैं करूंगा बयां सारा हाले दिल
मसऊद गुफ्तुगू न ज़बानी करूंगा मैं

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